मिट्टी की सेहत पर बनने वाली नीति में किसान का अनुभव कहाँ आएगा? भोपाल के भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान में 29–30 जून 2026 को हुए क्षेत्रीय परामर्श में यही दायरा सामने था। प्रस्तावित भारत मृदा स्वास्थ्य नीति के लिए मध्य और पश्चिम भारत से दो सौ से अधिक प्रतिभागी जुटे।

किसान उत्पादक संगठनों, राज्य विभागों, कृषि विश्वविद्यालयों, उद्योग और शोध संस्थानों ने हिस्सा लिया। जमीन के संसाधन, पर्यावरण, आजीविका और किसानों की प्रतिक्रिया चर्चा में थे। बैठक में नीति के अमल की रूपरेखा के लिए सुझाव तैयार हुए।

नीति की मेज से खेत तक

मृदा नीति का काम केवल खाद की मात्रा बताना नहीं होता। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन, एफएओ, के स्वैच्छिक मृदा प्रबंधन दिशानिर्देश इसे खेती और पर्यावरण की नीतियों से जोड़ते हैं। जमीन पर सुरक्षित अधिकार, लंबे समय का निवेश और स्थानीय जरूरतों के अनुसार शोध भी इस ढाँचे में आते हैं।

दिशानिर्देश कृषि प्रसार सेवाओं में मिट्टी की देखभाल को शामिल करने और मृदा सूचना प्रणालियाँ मजबूत करने की बात कहते हैं। खेत की मौजूदा दशा, उसमें हो रहे बदलाव और स्थानीय ज्ञान के बिना उपयुक्त उपाय चुनना कठिन है। इसीलिए मिट्टी के आँकड़ों को लगातार अद्यतन रखने की क्षमता भी नीति का हिस्सा बनती है।

अलग जमीन, अलग सवाल

एक खेत में पानी बहने से ऊपरी मिट्टी जाती है, दूसरे में लंबे समय की खेती से जैविक पदार्थ घट सकता है। एफएओ की तकनीकी सिफारिशें कटाव रोकने के लिए जमीन पर वनस्पति या फसल-अवशेष का आवरण बनाए रखने को कहती हैं। भोपाल का परामर्श अंतिम नीति से पहले क्षेत्रीय जरूरतें जुटाने का चरण है।

मुख्य बातें

  • परामर्श: 29–30 जून 2026
  • मध्य और पश्चिम भारत की भागीदारी

स्रोत और संदर्भ

  1. भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान, भोपाल · Bharat Soil Health Policy consultation, 29–30 June 2026 ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
  2. एफएओ · Voluntary Guidelines for Sustainable Soil Management ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं

सार्वजनिक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित संपादित लेख। स्रोत जाँच: 16 सितंबर 2026।

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